इरावती (६ उपम्यासत )

स्वर्गीय बाबू जयशद्ुर प्रसादजी को असामयिक मृत्यु से हिन्दी-साहित्य को अपार हानि हुई है; यह सत्य उनकी गति-विधि से परिचित प्रत्येक व्यक्ति जानता है साहित्य के विविध क्षेत्रों को वे अपनो प्रतिभा से बहुमुल्य रत्न प्रदान करते थे उनके अति निकट के परिचित यह भी जानते हैं कि वे एक निश्चित कार्यक्रम के अनुसार आगामी दिनों मे विविध साहित्य-स॒ष्टि करने वाले थे | उनके मन की इच्छाएँ हम सब के दुर्भाग्य से, वल्कि कहें, हिन्दी-साहित्य के दुर्भाग्य से पूर्ण हो सकी और वे अकाल काल-कवलित हुए

“कामरायनी' की समाप्ति के साथ ही उन्होंने प्रस्तुत पुस्तक “इरावती! का लिखना प्रारंभ किया था औपन्यासिक क्षेत्र में यह उतकी तीसटी पुस्तक थी। काल ने इसे भी पूर्ण मही होने दिया। हिन्दी में मोलिक ऐतिहाप्िक उपस्यात् नहीं के वरावर हैं। ऐसी स्थिति में प्रसादजी की दृष्टि इत ओर जाना स्वा- भाविक है। वह इस क्षेत्र मे कैसी सफलता प्राप्त करते, यह उनके नाटकों से परिचित विद्वान्‌ जानते हैं, और इस अप्टूरे उपन्यास को पढनेवाले पाठक समझेगे हम तो यही कह सकते हैं कि यह उपन्यास अगर पूरा हो गया होता, तो हमारा साहित्य गर्वपूर्वक दूसरी भाषाओं के उच्चकोटि के ऐतिटहवासिक उपन्यासों के बीच अपनी भी एक चोद रख सकता। डिन्तु आज तो इस दिशा में उनकी यह निशानी ही हमारे मार्ग को उज्ज्वल रखेगी। हमारा विश्वास है, पाठक इस श्रप्तरी कृति में भी प्रसादजी की आत्मा के दर्शन करेंगे

इस कृति के प्रकाशित होने मे अत्यन्त देर हो गयो है इस कारण साहित्य के प्रेमियों को उद्विग्गता हुई है और वे निराश हुए हैं। अपने इस अपराध के लिए हम क्षमा-प्रर्थी हैं

“इरावती” को पाण्ड्लिपि के साथ लेखक के कुछ संकेतपत्र भी ये उसमें से निम्न अंश पुस्तक की भाव-पीठिका समझकर उन्हों के हस्ताक्षरों में हम दे

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*२/५ काश

[मानवता ने अपने युगों के जीवन में सृष्टि का विनाश किया है और विनाश से सृष्टि की है। चित्र वनता-वनता विगड़ जाता है। जैसे प्रत्येक रेखाएं नपी-तुली होने पर भी कृत्रिमता से असंगत हो जातो हैं ! फिर से चित्र बनाने के लिए चित्रकार फूचियों को दूसरे पट पर पोंछने लगता है और तब ! हाँ सचमुच वह फूल-सा वन जाता है ! अति सुन्दर बनाने -के लोभ में प्रायः वस्तु को वीभत्स बना दिया जाता है, फिर तो उससे नाता तोड़ लेना आवश्यक हो जाता है हमारी अहिंसा अब हमारी हिसा करने लगी है। हमारा प्रेम हमी पे हेप करने लगा | और देखो धर्म पाप बनता जा रहा है ! ]

“>-अकाशक

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डरावती ( उपन्याप्त )

इरावती

उसकी आँखें आशा-विहीन सन्ध्या और उल्लास-विहोन उपा की तरह काली ओर रहनारी थी कमी-कभों उनमे दिगदाह्द का भ्रम होता, वे जल उठतो; परन्तु फिर जैसे घुझ जाती वह न॑ वेदना थी प्रसन्नता उसके घूँघराले वाल जटा बन पाये छोटी-छोटी स्वतः बढ़ने वाली दाढ़ी भी छुछ यों ही कालिमा से उसकी सुवर्ण-त्वचा को रेखाकित कर रही थी। शरीर केवल हांड से बना प्रतीत होता था; परन्तु उसमे वल का अभाव नहों था वह अभी आकर, शिप्रा के शीतल जल से स्नान कर घाट पर वैठा था। उसके मणिवस्ध भें, किसी नाग- रिका के जूढ़े को शिप्रा में गिरी हुई माला पड़ी थी, अकारण उसमें अभी सन्ध थी। फिर भी उसे भूंधने की इच्छा नहीं। वह परदेशी था उसकी एक छोटी गठरो बढ़ी पढ़ी थो। शिप्रा में जल-विहार करने वालों की कमी ने थी बसन्‍्त की सन्ध्या मे आकाश प्रसन्न था प्रदोष का रमणीय समय, किन्तु वह तो अन- मना, थकानया तब भी जैसे इन सव की वह उपेक्षा कर रहा था।

तूर्व-नाद और दुन्दुभि का गम्भीर घोष गूँजने लगा। चारो ओर जैसे हल- चल मची लोग उठकर चलते लगे परन्तु वह स्थिर बेठा रहा किसी ने पूछा पूछा--तुम ने चलोगे क्या ?”

“कहाँ 2”!

“मन्दिर मैं.

“विस मन्दिर मे ?”

/'यहीं महाकाल की आरती देखने /---

“अच्छा कहकर भी वह उठा नहीं घाट जन-शुन्य हो गया। मन्दिर की पताका घ्ूमिल आकाश में लदरा रही थी बह वैठा रहता; परन्तु चपल घोडों से सब्जित एक पुष्प-रय, वहीं घाटी के समोप आकर रुका। उस पर बैठे हुए युवक ने सारधी से कहा--''बस यहीं, किन्तु वे सब कहाँ हैं, अभी नहीं आये इतने में अश्वारोहियो की एक छोटी-सो टुकड़ी वहाँ आकर खडो हुई रघी ने कुछ संकेत किया वे सव उतर पड़े शिप्रा-तट के बट की शाखाओं में घोड़ो के

इरावतों : ११

डोर अटका दिये गये कुछ परिचारक भी दौड़ते हुए आये वे सब वहीं ठहर गये केवल एक उल्काधारी महाकाल के ग्रोपुर की ओर बढ़ने लगा। पीछे-पीछे ये लोग चले रथी का डील-डौल साधारण था, किन्तु उसका प्रभाव असाधारण | उसके समीप से लोग हट जाते

कुतूहूल और वया, पहला परदेसी इल्हीं लोगों के साथ, पीछे-पीछे मन्दिर में घुसा सब लोग व्यस्त थे पूजन आरम्भ हो चुका था नागरिकों का झुंड भी

चला रहा था किन्तु जाने क्यों उस रथी पर हृष्टि जाते ही जैसे सब सशंक हो जाते पथ छोड़ देते *

मन्दिर के विशाल प्रांगण में नर-नारी की भीड़ उमड़ रही थी। महाकाल का प्रदोष-पूजन भारत-विख्यात था उसमें भक्ति और भाव दोनों का समावेश था सात्विक पूजा के साथ दत्य-गीत-कला का समावेश था। इसीलिए बौद्ध- शासन में भी उज्जयिनी की वह शोभा सजीव थी

महाकाल के विशाल मन्दिर में सायंकालीन पूजन हो चुका था दर्शक अभी भी भक्ति-भाव से यथास्थान बैठ रहे ये मण्डप के विशाल स्तम्भों से वेले के गजरे झूल रहे थे स्वर्ण के ऊँचे दीपाधारों में सुगन्धित तैलों के दीप जल रहे थे। कस्तूरी अगरु से मिली हुई ध्वप-गन्ध, मन्दिर में फैल रही थी। गर्भगृह के समीप एक मुक्तकेश ब्रह्मचारी एक सौ एक वत्तियों की जलती हुई अएरती को अपनी बड़ी-बड़ी रतनारी आँखों से देख रहा था। पुष्प-प्ंगार से भूषित महाकाल-मूर्ति की विशाल देहली पर बीचोबीच वह आरत्ती जल रही थी, जिसे अपनी दृढ़ भुजा से ब्रह्मचारी ने घुमा कर रख दी है पटह, तुर्य शान्त नीरव थे। मण्डप का चौकोर भाग बीच भें खाली था ) दर्शक चुप थे सहसा मृदंग और चीणा चज उठी | जाने किधर से नुपुर को झनकारती हुई एक देवदासी उसी रिक्त भूमिका में लास्य-मुद्रा में खड़ी हुई, मावाभिनय संगीत और दृत्य साथ-साथ चला |

उमा-तपस्वी हर के समीप पृष्प-पात्र लेकर जाती है। वसन्‍्त का प्रादुर्भाव होता है उमा के अंग-अंग में श्री, यौवन और कमनीयता तरंग-सी उठने लगती है | कोयल की पंचम तान, वीणा की मधुर झनकार के साथ वह अप्सरा महाकाल के समीप पुष्पांजलि विशवर देती है

निशीय-व्यापी संगीत-समारोह का यह मंगलाचरण था। आज मन्दिर में विशेष उत्सव की आयोजना थी दर्शकों में एक ओर रथारोही व्यक्ति बैठा था उसके साथी भी विशेष सावधान थे किन्तु उसकी हृष्टि देवदासी पर थी एक बार भी देव-प्रतिमा की ओर उसने भूल से भी नहीं देखा उद्विग्न होकर उसने « अपसे साथी से घीरे से कहा--

१२ इराचती

“यह देव-मन्दिर है या रंगशाला ?”

“कुमार ! शान्त रहिए !” साथी ने कहा

कुमार की आँखे जल उठी उसने एक बार अपने साथियों को देखा, जेसे अपने बल का अनुमान करता हो फिर उसने देखा अपने समीप हो खडे हुए उस युवा पथिक को, जो तन्मय होकर अपलक आँखों से नर्तकी को देख रहा था मुतिमती कला का वायवीय आकर उसके हृदय के भीतर स्पर्श करके मधुरता से भर रहा था दुमार व्यग से हँस पडा उसने चोंककर कुमार को देखा जैसे जन्मजात दो विरोधी एक-दूसरे को अकस्मात्‌ दीख पड़े, वही दशा घन दोनों की हुई

नर्तकी ने गायन प्रारम्भ कियां। उसको पश्चम तान सभा-मण्डप में गूंज उठी भर युवा परदेशी ! वह तो जैसे पागल हो उठा उसकी आँखे जैसे फैल गयी बह कुछ पहचान लेने का प्रयत्न कर रहा था अब वह रुक नहीं सकता, बोलना ही चाहता था कि नवागन्तुक कुमार ने ललकार कर कहा-- बन्द करो निनदनोय प्रदर्शन को ! देव-मन्दिर के नाम पर विलासितां के प्रचार को बन्द करों ३!

महाकाल-प्रतिमा के समोप बैठा हुआ ब्रह्मचारी तन कर खड़ा हों गया। उसने प्रतोक्षा की, अब जनता में से कोई प्रतिवाद करता है किन्तु सहसा नर्तकी के आभुषणों की तरह भनभना कर वे मौन रह गये; ब्रह्मचारी ने कहा---देवा- धिदेव की स्तुति करने से क्र जाता, सो भी किसो अपरिचित की आज्ञा पर, उचित नहीं इसव्ती ! तुम चुप क्यों हो १”

इरावती ने आरम्भ किया। कुमार का मुंह लाल हो उठा। उसने कड़क फर कहा---'मौर्य साम्राज्य के कुमारामात्य बृहस्पतिमित्र का परिचय तुम नहीं जानते देवकुलिक !”

"शान्त ) तुम तो भाषा का भी साधारण ज्ञान नही रखते कुमार | देवकुल मृतकों का होता है देवता का नहीं ।” ब्रह्मचारी अपनी पूर्ण मनुप्यता में त्द कर खट्टा था ! वृहस्पतिमित्र उसकी ओर देखने का साहस छोड चुका था, परन्तु उसने ढिठाई से कहा--'कहाँ है उज्जयिनी का श्रादेशिक महामात्य। उसको मेरे आगमन की सूचना दो और इस नर्तको को पकड़ कर दुर्ग में ले जाओ।"

बृहस्पतिमित्र का एक साथी दौडा हुआ बाहर यया दूसरा समा मण्डप मे इरावतो की ओर चला दर्शकों मे भगदड पडी रंग में भंग हुआ | हिन्‍्तु युवा दर्थिक अब अपने को रोक सका वह भी मण्डप के बोच इरावती के समीप

इरावती : १३

डोर अटका दिये गये | कुछ परिचारक भी दौड़ते हुए आये थे सब वहीं ठहर गये केवल एक उल्काधारी महाकाल के गोएुर की ओर बढ़ने लगा पीछे-पीछे मे लोग चले | रथी का डील-डौल साधारण था, किन्तु उसका प्रभाव असाधारण उसके समीप से लोग हट जाते

कुतूहल और वया, पहला परदेसी इन्हीं लोगों के साथ, पीछे-पीछे मन्दिर में घुसा सब लोग व्यस्त थे पूजन आरस्भ हो छुका था। नागरिकों का झुंड भी चला रहा था। किन्तु जाने क्यों उस रथी पर हृष्छि जाते ही जैसे सब सर्शक हो जाते पथ छोड़ देते

मन्दिर के विशाल प्रांगण में नर-नारी की भीड़ उमड़ रही थी महाकाल का प्रदोष-पूजन भारत-विख्यात था उसमें भक्ति और भाव दोनों का समावेश था सात्विक पूजा के साथ दृत्य-गीत-कला का समावेश था। इसीलिए वबौद्ध- शासन में भी उज्जयिनी की वह शोभा सजीव थी

महाकाल के विशाल मन्दिर में सायंकालीन पूजन हो चुका था दर्शक अभी भी भक्ति-भाव से यथास्थान बैठ रहे थे। मण्डप के विशाल स्तम्भों से वेले के गजरे झूल रहे थे स्वर्ण के ऊँचे दीपाधारों में सुगन्धित तैलों के दीप जल रहे थे : कस्तुरी अगरु से मिली हुई ध्षुप-गच्ध, मन्दिर में फेल रही थी। गर्भग्रह के समीप एक मुक्तकेश ब्रह्मचारी एक सौ एक वत्तियों की जलती हुई आरती को अपनी बढ़ी-बड़ी रतनारी आँखों से देख रहा था। पुष्प-शुंगार से भूषित महाकाल-मूर्ति की विशाल देहली पर चीचोबीच वह आरती जल रही थी, जिसे अपनी दृढ़ भुजा से ब्रह्मचारी ने घुमा कर रख दी है | पटह, तूर्य शास्त नीरव थे। मण्डप का चौकोर भाग बीच में खाली था। दर्शक चुप थे | सहसा मुदंग और वीणा बज उठी जाने किधर से नूपुर कों झनकारती हुई एक देवदासी उसी रिक्त भूमिका में लास्य-पमुद्रा में खड़ी हुई, भावाभिनय संगीत और दृत्य साथ-साथ चला

उमा-तपरवी हर के समीप पुष्प-पात्र लेकर जाती है। वसन्‍्त का प्रादुर्भाव होता हैं। उमा के अंग-अंग में श्री, यौवन और कमनीयता तरंग-सी उठने लगती है। कोयल की पंचम तान, वीणा की मधुर झनकार के साथ वह अप्सरा महाकाल के समीप पुष्पांजलि विखेर देती है

निशीथ-व्यापी संगीत-समारोह का यह मंगलाचरण था| आज मन्दिर में विशेष उत्सव की आयोजना थी दर्शकों में एक ओर रथारोही व्यक्ति चेठा था उसके साथी भी विशेष सावधान थे किन्तु उसकी दृष्टि देवदासी पर थी एक

बार भी देव-प्रतिमा की ओर उसने भूल से भी नहीं देखा | उद्विस्न होकर उसने अपने साथी से धोरे से कहा---

१२ : इरावती

“यह देव-मन्दिर है या रंगशाला रै?

“कुमार ! शान्‍्त रहिए [” साथी ने कहा

कुमार की आँखें जल उठी ! उसने एक बार अपने साथियों को देखा, जैसे अपने बल का अनुमान करता हो फिर उसने देखा अपने समीप ही खडे हुए उस युवा पथिक को, जो तन्‍्मय होकर अपलक आँखों से नर्तकी को देख रहा था मूत्तिमती कला का वायवीय आकर उसके हृदय के भीतर स्पर्श करके मधुरता से भर रहा था। कुमार व्यग से हँस पड़ा उसने चौंककर कुमार को देखा जैसे जन्मजात दो विरोधी एक-दूसरे को अकस्मात्‌ दीख पढ़े, वही दशा उन दोनों की हुई

नर्तकी ने ग्रायन प्रारम्भ किया। उसकी पद्चम तान सभा-मण्डप में गूंज उठी और युवा परदेशी ! वह तो जैसे पांगल हो उठा | उसकी आँखे जैसे फेल गयी वह कुछ पहचान लेने का प्रयत्न कर रहा था अब वह रुक नही सकता, बोलना ही चाहता था कि नवागन्तुक कुमार ने ललकार कर कहा---बन्द करो निन्‍्दनीय प्रदर्शन को ! देव-मन्दिर के भाम पर बिलासिता के प्रचार को वन्द करो ।!!

महाकाल-प्रतिमा के समीप वैठा हुआ ब्रह्मचारी तन कर खडा हो गया। उसने प्रतीक्षा की, अब जनता में से कोई प्रतिवाद करता है किन्तु सहसा नर्तकी के आभूषणों की तरह भनभना कर वे मौन रह गये; ब्रह्मचारी ने कहा--दिवा- धिदेव की स्तुति करने से रुक जाना, सो भी किसो अपरिचित की आज्ञा पर, उचित नही इरावरती ! तुम छुप क्यों हो ?””

इरावती ने आरम्भ किया कुमार का मुंह लाल हो उठा। उसने कडक कर कहा---/ मौर्य साम्राज्य के कुमारामात्य वृहस्पतिमित्र का परिचय तुम नहीं जानते देवकुलिक |

“शान्त ! तुम तो भाषा का भी साधारण ज्ञान नही रखते कुमार ! देवकुल मृतकों का होता है देवता का नहो ।” ब्रह्मचारी अपनी पूर्ण मनुष्यता मे तन कर खड़ा था। वृहस्पतिमित्र उसकी ओर देखने का साहस छोड चुका था, परल्तु उसने ढिठाई से कहा--कहाँ है उज्जयिनी का प्रादेशिक महामात्य। उसको मेरे आगमन की सूचना दो और इस नतंकी को पकड कर दुर्ग मे ले जाओ ।”

सृहस्पतिमित्र का एक साथी दौडा हुआ बाहर गया दूसरा सभा मण्डप में

इरावती की ओर चला दर्शकों मे भगदड पडी रंग मे भंग हुआ किन्तु ग्रवा पथिक अब अपने को रोक सका | वह भी भण्डप के बीच इरावती के समोप

इरावती : १३

वायु-वेग से जाए पहुँचा इरावती से उसने धीरे से कहा-- हरा ! मैं हूँ, डरने की कोई बात नहीं मेरे रहते तुम्हारा अनिष्ट नहीं हो सकता ।*

इरावती कृतज्ञता से उसकी ओर देख कर बोली --/ धन्यवाद ! अग्निमित्र ! किन्तु मैं बन्दी होना चाहती हूँ ।*

बह्मचारी हँस पड़ा अग्निमित्र संकोच में गड़-सा गया। उसकी कृपाण कटिवस्ध में चली गई नतमस्तक वह खड़ा रहा। कुमारामात्य का साथी इरा बती को जब पकड़कर ले चला, तब ब्रह्मचारी ने धीरे से उसे अपनी ओर खींच लिया

बृहस्पति ऐंठा हुआ उद्धत-भाव से दूसरी ओर देख रहा था पलक मारते यह घटना हुई सभा-मण्डप जन-शून्य हो गया केवल कुमार के साथी और गर्भग्रह के द्वार पर अग्निमित्र तथा ब्रह्मचारी खड़े रहे

प्रादेशिक के आने तक सब सौन बने रहे केवल ब्रह्मचारी के नेत्रों से उल्का की तरह एक ज्वाला निकलती और फिर अपने आप बुझ जाती थी। जैसे उसके हृदय की शीतलता पानी लेकर खड़ी थी

प्रादेशिक से कुमार को नमस्कार किया। गर्वोद्धत कुमार बृहस्पति उचित उत्तर देकर पूछ वैठा---' क्यों जो, तुमने धर्म-विजय की आयोजना और उसके सम्बन्ध में निकली हुई आज्ञाओं का अच्छी तरह पालन किया है ? देखता हूँ कि उज्जयिनी के प्रादेशिक ते साम्राज्य को केवल नियमित कर भेज देंना ही अपना कर्तव्य समझ लिया है ।”

“आर्य ! मैं अपनी भूटि अभी तक नहीं समझ सका ।--सविनय प्रादेशिक ने कहा

“क्यों समझोगे धर्म के नाम पर शील का पतन, काम-सुखों की उत्तेजना और बिलासिता का प्रचार तुमको भी बुरा नहीं लगता न! स्वर्गीय देवप्रिय सम्राट अशोक का धर्मानुशासन एक स्वप्त नहीं था। सम्राट उस धर्म-विजय को सजीव रखना चाहते हैं। किन्तु वह शासकों की कृपा से चलने पावे तब तो तुम्हारी छाया के नीचे ये व्यभिचार के बड्डे, चरित्र के ह॒त्याग़ह और पाखण्ड के उद्यम सबल हैं। और तुम आँखें बन्द किये निद्रा ले रहे हो। मैं किसी के धामिक कृत्य में बाधा नहीं देना चाहता, किन्तु चारित्य विनाश और हिंसा- मूलक क्रियाओं का रोकना मेरा कर्तव्य है मैं वेश्याओं से घिरी हुई देव-प्रतिमा से घृणा करता हूँ। यह श्ृज्भार-लास्य धर्म है क्या ?”

अब ब्रह्मचारी से नहीं रहा गया। उसने कहा--“धर्म क्या है और क्या. नहीं है, यह महाकाल-मन्दिर का आचार्य वौद्ध-धर्म-महामात्र से सीखना तहीं

१४: इरावती

चाहता यह व्याख्यान मन्दिर में देकर कही और देने को कृपा कीजिए मुझे तो स्पष्ट राजा की आज्ञा मिलती चाहिए। शासक मुझसे क्‍या चाहता है शासन-दण्ड-धर्म मे परिवर्तन नहीं करा सकता। हाँ, उसके राष्ट्र में मेरा धर्म कहाँ तक बाघक है, यह मैं देख लूँगा ॥”

कुमार का क्रोध अब अपने में नहो रह सका उसने उच्च कंठ से कहा-- “तो सुनो, मौर्य-साम्राज्य को प्रधान नीति धर्म-संशोधन कौ है। जितने अना- चार है, वे सब्र राष्ट्र मे होने पावेंगे ।”?

ब्रह्मचारी की आँखों से एक बार फिर ज्वाला निकली महाकाल के पुजारी ने हृढ कंठ से कहा--/किन्तु भगवान का ताण्डव-हृत्य क्या है? तुम नहीं जानते कुमार ! उस नृत्य को रोकने की किसमे क्षमता है ! तुम्हारी समस्त शक्ति उन शक्तिनाय को विभूति का एक कण है। बड़े-बड़े साम्राज्य और सम्रादू उसकी एक दृष्टि में नाश होते है सावधान ! ...!

ब्रह्मचारी का वाक्य पूरा नही होने पाया था कि दो उल्काधारियों के साथ एक सम्स्रान्त राजपुरुष ने दौड़ते हुए आकर कहा--कुमार की जय हो ! सम्राट शतधनुप ने निर्वाण प्राप्त किया ।”” एक क्षण में महान्‌ परिवर्तन ! ब्रह्मचारी ने मुस्करा दिया अम्निमित्र चकित हो रहा था और युवा कुमार यह नहीं सोच सकता था कि वह शोक प्रकट करे या राज्य प्राप्त करने का हर्ष ! क्योकि साम्राज्य के सिहांसन पाने मे बड़ी बाधाएँ थी वह अवनत मस्तक चुप खडा था। राजनिधन का समाचार मन्दिर के कोने-कोने मे फेल गया साथ ही-- उपासको ने दवे, किन्तु दृढ़ स्व॒र में कहा “यह महाकाल का कोप है।”'

महाकुमार बवृहस्पतिमित्र ने उस अवसाद से ऊपर उठने की चेष्टा करते हुए कहा--/प्रादेशिक ! इस नर्तकी को अभी कुछ दिनो के लिए संघ मे भेज दो और में कुसुभपुर जा रहा हूँ जो कर है वह भी सेना के साथ मेरे पीछे-पोडे शौत्र पहुँचे, इसमे भूल हो ।/

वृहस्पतिमित्र मन्दिर-प्रांगण से बाहर हो गया। और पुष्परय पर बैठ छर वेग से उसी रात्रि के अत्थकार मे पाटलिपुत्र की ओर चल पड़ा। उन्यपिन कद भग्रभीद जनता ने देखा कि उल्काधारी अश्वारोहियो के बीच एक ह्ूर दिशपऋ- परिवार भर्धर्व-न॒गर की तरह उडा जा रहा है

जनता लौद कर प्रागण में बाई। ब्रह्मचारी निश्चल-भाव से यरमईः द्वार पर खड़ा था और अभ्निमित्र जैसे निर्षाय छटपटा रहा था।

इरावती चुपचाप खड़ी थी उसको दृष्टि से तिरस्कार की सदर कठ रह

थी प्रादेशिक प्रतीक्षा कर रहा था भिक्षुणी-संघ में समाचार भेजा जा चुका था।

अग्निमित्र अपने को उलझनों से बाहर करने के लिए अभी तक संघर्ष कर रहा था| उसने कहा--इरा ! तुम भिक्षुणी होने के पहले मुझसे कुछ बातें कर लोगी ?/'

प्रादेशिक उद्विग्न मन से साम्राज्य के उलद-फेर की वात सोच रहा था उसने अपने साथी सैनिक से कहा-- मैं जाता हैँ यह स्त्री तब तक अपने इस परिचित से बात करती है; फिर भिक्षुणी-संघ से किसी के जाने पर उसी के साथ इसे पहुँचा देना समझा !

प्रदिशिक महामात्य चला गया इरावती ने कहा-- क्या बिना मुझसे पूछे तुम रह नहीं सकते ? अग्नि ! मैं जीवन-रागिनी में वजित स्वर हूँ मुझे छेड़कर तुम सुखी हो सकोगे ।”!

४“दरा | यह असस्भव है। मैं तुमसे अपनी असमर्थता का विवरण देना चाहता हूँ जिस अवस्था में मुझे तुमसे अलग होना पड़ा....!"'

““5हरो; मुझे उसकी आवश्यकता नहीं तुम यही कहोगे कि तुम्हारे गुरु- जन मेरा और तुम्हारा सम्बन्ध अच्छी आँखों से नहीं देख सके और तुम उनका प्रत्याख्यान नहीं कर सकते थे ठीक है ! गुरुजन ! वाल्य-काल में जितनी सेवा- शुश्नूपा, प्यार-दुलार और आज्ञाकारिता तुम्हारी कर चुके हैं, उस सब का प्रति- दान चाहते हैं और तुम ऋणी हो, उसे चुकाना पड़ेगा | मेरा तो तुमसे कुछ प्राप्य नहीं झिड़की, मारपीट और चिढ़ाता यह सब जो था वह तो शैशव में ही मिल चुका था फिर अब आदान-प्रदान कैसा ?

“इरा $ तुम मुझे कहने भो दोगी ! तुम्हारे निरुद्देश्य होने पर मैं कहाँ- कहाँ भटकता हुआ यहाँ...”

“मुझसे मिले, मुझे बचाना चाहते हो यह तुम्हारी अनुकम्पा है परल्तु भेरे ऊपर मेरा भी कुछ ऋण है। मैंने भी अपने को, इतने दिनों से संसार से सार लेकर--भीख माँग कर--अनुग्रह से अनुरोध से जुठाकर कैसा कुछ खड़ा कर दिया है उस मूर्ति को क्यों वियाड़ ? स्त्री के लिए, जब देखा कि स्वावलम्बन का उपाय कला के अतिरिक्त दूसरा नहीं; तव उसी का आश्रय लेकर जो रहो हैं। मुझे अपने में जीने दो ।”'

“किन्तु बहू भी अब कहाँ ? तुम तो पिक्षुणी बनते जा रही हो, इरा !”

“देवता के सामने नाच चुकी, अब देखूँ अदेवता--अनात्म मुझे कौन नाच नचाता है। घबराओ मत अग्निभित्र, मैं कदाचित्‌ तुम्हारे लिए अपने को प्रस्तुत

१६ : इरादती

करती होऊँ; वह नही सकती वह देखो, मिक्षुणियों का संघ रहा है। भणे जाना होगा | तुमको इस समय के लिए इसे स्वीकार करना होगा दिए उससे ध्यान से इन बातो को सुनने वाले ब्रह्मचारी को देय कर गगछाए हि और कहा--आर्य ! क्षमा कीजिए ।” हर

ब्रह्मचारी ने धीरे-धीरे आकर अग्निमित्र का हाथ पवड़ लिया शी हे वह पूरी आँख नही खोलता था उसकी आँखों से ज्यालों निकल कर मुझ जार, थी।

इरावतो ने उन भिक्षुणियों के साथ प्रस्थान पिया, जो दुर एप ने आओ प्रतीक्षा कर रही थी

रत क्र धो हर इस घटता को बीते कई महोने हो गये। अखिमिद मईजएस्‍नाईा ब्रह्मचारी के पास रहते लगा और ब्रह्मवारी दिन-रात पुएदो डेहरे दि हो कीप- कर पुस्तकों के पढ़ने में और कुछ लिपने मे समय बिताने ऋरा ! बेइर चारा प्रातः पुजन के समय गर्भग्रह मे दिखाई पडता

शारदी पूर्णिमा थी। शिप्रा में छोटी-छोटी लहरे उंझ्शए आशने ढो बाना बना रही थी। नागरिकों की छोटी-छोटी नावें जल-रिशर के गए पराचत्ा घूम रहो थी | उधर विहार के उपोसयागार मे भिछुद् एम भा झा फिन से सटे चंक्रम पर भिक्षुणियाँ भी अपने विहार से झजर एकश हे एस ये सथागार में भिक्षु-सघ प्रवारणा कर रहा या। और रे छोटा-सा समूह प्रवारणा के लिए अपनी ओर हे फविलिफे रहा था। उत्पला विक्षुणी छुनी गई। उठज्ो धम्गेरें एक निराश्रया बालिका थी। नीला चक्रम के एज झत देख रही थी | उसने सहता धूमकर कहा--

““भगिनी इरा ! कैसी सुन्दर राठ है

“मत कहो ऐसी बात धामपेरी नोट बह शल्य सूद ने अल हार सलाम बाली है 0”' पास ही बैठी हुई एक भिष्ठर्रे प्रत्याख्यान करने की इच्छा से उद्ने दृद्ना--ज्या

“रात्रि का सौन्दर्य, काम-भोद हू भगिनी उसका वर्णन वजित है ।”-..

“बाह ! यह कौमुदी-महेल्दव ! रात तो नाचने की है भगिनों ! तुद स्पेद झसे हो। नही ! मैं निदोद ! इसी चाँद हे

3 वी

कस्ती हैं में उसको अभ्यर्थना में नाचूंगी ।! इरा का कलपूर्ण हृदय उल्लसित संघादो का छोर फैलाबा वह भनी शिणमाया ही थी।

मिक्षुणी नहीं हुई थो उपसम्पदा नहीं मिली थी। उसने नीला को अपना दर्शक बनाया और नक्षत्र विजड़ित क्षद्र आकाश-खण्ड की तरह अपने को भूली हुई-सी नाचने लगी। भिश्षुणियों के दल में से एक कोलाइनल का स्वर उठा जौर फिर

शान्‍्त हो गया अदुभुत ! उन विहार की प्राचीर में वन्‍्द भिक्षुणियों को यह दृश्य जीवन का यह उल्लसित रूप देखने को कहाँ मिला था। वे भी मूक होकर चकित- सी देखने लगी। भिक्षुणी-संघ की प्रतिनिधि उत्पला जो प्रवारणा के लिए चुनी गई थी, उपोसवागार के द्वार की ओर मूँह किये सूत्र पाठ कर रही थी। वह प्रतीक्षा में थी कि भिन्षु-सं्र की प्रवारणा हो जाने पर वह भी उपोसधागार में जाकर भिक्षुणी-संघ की ओर से प्रवारणा करे।

भिक्षु-संत्र को प्रवारणा समाप्त हुई। प्रतिनिधि उपला उपोसवागार में जाकर खड़ी हुई वह कहते लगा--आर्यों | भिक्षुणी-संव देखे, सुने और शंका किये हुए सभी दोपों के लिए भिश्चु-संघ के पास प्रवारणा करता है ।'' इतने में एक सिक्षुणी दौढ़ती हुई उपोत्तवागार में पहुँची “ऐसा कमी देखा नहीं गधा--ऐसा कभी सुना नहीं गया'--उसने जैसे घवड़ा कर कहा | प्रवारणा रुक-सी गई।

“क्या हैं भगिनी ?”--स्थविर ने पूछा

“अद्भुत दृत्य !

“नृत्य ! और बिहार में !”!

यही चंक्रम पर, भन्‍्ते !/”

आश्चर्य त्रीर क्रोध से भरे हुए भिक्षुओ का दल बाहुर आया उन लोगों ने देखा सचमुच इरा ताच रही है। सौन्दर्य का उन्मुक्त उल्लास ! उनका क्रोध, उनकी फटकार क्षण भर के लिए स्थगित हो रही जैसे वे भी इस अद्भुत उनन्‍्माद को हृदयंगम कर लेना चाहते थे

अकेली इरावतो काँख मूँंद कर नाच रही थी। चंक्रम के नीचे शिप्रा, ऊपर थाकाश में चन्द्र, भिप्रा के कुजों में स्तिग्ध पवन सत्र स्तव्ध थे। स्थचिर ने चिल्ला कर कल्ा--- बन्द करो ।”!

इस विराम पर चुकी थी, उसने आंखें खोल दीं। और देखा कितनो भांयों की रोप-भर्री इप्टि उस पर पट रही थी आाज वह दूसरी वार दृत्य करन से दाकी गट थी उसने अपने “आहत अभिमान को बठोरते हुए कहां---

है नर या के 8 लुया £

पुृद्ध : हरावती

“तुमने यह आपत्तिजनक कर्म विहार में वयो क्रिया ? यह फिसकी शिक्षमाणा है ? वह सामने आवे ।--स्थविर ने गंभीरता से कहा

नीला इरावती से लिपट गई थी। भय ओर प्रेम से वह विह्लल थी | एक मिक्षुणी ने स्थविर के समीप आकर प्रणाम किया उसते कहा--कई महीनों से बह नर्त्तकों प्रादेशिक महामात्य के आज्ञानुसार भिश्षुणी-सप मे रहती है मेरे लिए बया थाज्ञा है ?”

स्यविर कुछ सिन्‍्ता में पड़ गया। उसने धीरे से कहा--/वह स्वेच्छा से आई हुई नही है तब तो राजकीय आज्ञा से भिश्षु-संघ भी परिचालित होगा यह तो अनर्थ है ।””

“मैंने किया बया ? मेरी समझ में तो यही आया कि मैं देवमन्दिर रो छीन कर बौद्ध-विहार मे भेज दी गई हैं | यही पेट भरती हू, वस्त्र पहनती हैँ यह दूसरी बात है कि मुझे ये सब अच्छे नही लगते, परन्तु इन सबका ऋण कैसे चुकाऊँगी मेरे पास सत्य को छोड़कर और है ही बया ? आज इतले स्त्री-पु्षो के समारोह मे मैं तो अपना कर्तव्य समझ कर ही शृत्य कर रही थी। यह भी अपराध है, तब तो मुझे छुटूटी दीजिए ।”

स्थविर विमूढ़-सां खड्या था। भिक्षु और भिक्षुणी-सघ उस राजहंसी-सी ग्रोवा- भंगिमा को आश्चर्य से देख रहा था ठहर कर, तथागत का स्मरण करते हुए वृद्ध स्थविर ने कहा--/भिक्षुणी-सघ की प्रवारणा स्थगित की जाती है। भिशुणी-

* संघ अपने विहार में लौट जाय ।/”

उत्पला के पीछे-पीछे भिश्षुणियाँ भिक्षुणी-विहार में चली, सबके पीछे इरावती थी इरावती भिक्षुणी-विहार मैं जाकर भी अपनी कोठरी मे नहीं गई ' इस निस्तन्द्र निशीय में वह भौचकी-सी चुपचाप शिप्रा-तट के ऊँचे चक्रम पर जा खडी हुई रात्रि का तृतीय पहर था और वह अपने जीवन के प्रथम प्रहर मे थी। संसार नित्य यौवन और जरा के चक्र में घूमता है; परन्तु मानद- जीवन में तो एक ही बार यौवनोन्माद का प्रवेश होता है, जिममे अनुइस्थ का प्रत्याख्यान और स्नेह का आलिगन भरा रहता है। वह भिछुद्रियों की मतुष्ट चेप्टा को आश्चर्य से देख रही थी। सब धीरे-घोरे अपने स्पान पर छाहुर सोने लगो हाँ, क्रिसी-किसी को प्रवारणा स्थगित होने से इरावतो पर झुँछझचाहट भी थी। कोई यह भी सोच रही थी कि इसे भिश्ुपरो-संघ में झे प्रवद्ित झरने का उपाय किया जाय इरावती के प्रति उतको अन्यमनस्वता ने यह अददर दिमा कि कोई उससे यह पूछता कि 'बया आज जागरण ही करेगी ?!

शिप्रा के तद प्रर पाठ की वृक्षय्रेणी तारक-खबित सीसे अम्दर छो स्तिएे

की तरह वेलबूटों में चित्रित थी शिप्रा की ओर मुंह किये इरावती उस शून्यता

अपने को मिलाती हुई भावता से ऊपर उठने का उद्योग कर रही थी; परच्तु व्यर्थ ! उसका शून्य उसो तक सीमित नहीं रहा घीरे-धीरे विस्तृत होकर चाँदनी से प्रभा, नदी से प्रवाह, विश्व में से मूर्तमत्ता निकाल फेंकने का प्रयास, उसी को सोचनेवाली वना कर हँस पड़ा

नदी में जलकणों का प्रवाह शून्य है, उनका शीतल स्पर्श भ्रम है, पवन शरीर को स्पर्श करता है कि नहीं, इसका उसे ज्ञान नहीं वह मृक शिलाखंड की तरह बैठी रही रात की निस्तव्धता उसके हृदय की धड़कन को और स्पष्ट करने लगी वह अब उसी का शब्द सुन रही थी। क़मशः वह स्पष्ट हो रहा था | उसी को, जीवन देवता की आराधना का संगीत सा सुन रही थी | विश्व जुन्य था

फिर सहसा उसने देखा एक छोटी-सी नाव उसी से नीचे से चली जा रही है तो जाय, उसे क्या ! वह तो धड़कन गिन रही थी

ओर नाव पर महाकाल के ब्रह्मचारी के सामने, दोनों हाथों से डॉड़ चलाता हुआ अग्निमित्र बैठा था

ब्रह्मगारी ने कहा--“अग्निमित्र | अब मैं पर्यटन के लिए बाहर जाना चाहता हूँ तुम महाकाल भगवान्‌ की सेवा-पूजा करते रहोगे, ऐसा मेरा विश्वास है ।”

डॉड चलाना बन्द करके अग्निमित्र ने कहा-- ऐसा क्‍यों गुरुदेव !””

“इसलिए कि मुझे अपनी आँखों से देखना होगा कि आर्यावर्त्त में कहों पौरुष बच गया हैँ ! कहीं तेज किसी राख में छिपा तो नहीं है ! इन कई महीनों में शास्त्रों का अध्ययन करके जो रहस्य मैं समझ पाया हूँ, उसका प्रचार करने के लिए कहीं ल्ेत्र है कि नहीं ! यदि होगा तो मैं फिर लौट आऊँगा। इसीलिए आज इस जवल्ती का मौन सौन्दर्य, शिप्रा की श्यामल कछार देखने जाया हूँ ।””

अग्निमित्र थुप रहा नाव धीरे-धीरे वह रही थी ब्रह्मचारी अपनी आँखों से उकसाते हुए अग्निमित्र को देख रहा था उत्तर की प्रतीक्षा थी

“किन्तु क्या वह कोई नया रहस्य है भगवन्‌ !”

“नहीं, है तो वह चिरन्तन ! किन्तु अब जीर्ण हो चला है। नवीनता का उस पर आवरण चढ़ाता होगा आर्य-धर्म का आरम्भिक उल्लासमय स्वरूप यद्यपि अभी एक वार ही नष्ट नहीं हो गया है, फिर भी उसे जयाना ही पड़ेगा वह अलस, अवसाइस्रस्त, अपनी कायरता के कारण विवेक का ढोंग करने लगा है शिविल, जैसे किसी को कुचल देने का मिध्या जभिनय करता लड़खड़ाता हुआ

+ इरावती

जीवन-देवता को हो कुचल रहा है। मुझे ऐसा मावूम होता है ऊि प्राचीन आर्य बोर संस्कृति को लौटाने के लिए प्राचीन कर्मों ] किन्हेँ 3 ९8 के अतिवाद के रण मानवता के का बा।” 2 35307/7५7

कायरता, विश्वास का अभाव और निराशा का पर उत्साह, साहस और आत्म-विश्वास को प्रतिप्ठा करती होगा ।'!

“हम मच ही निर्वोर्य हो रहे हैं।”

“हाँ ! मैं इसीलिए अ्यत्त करूँगा कि इनकी वाणी शुद्ध, आत्मा निर्मल और शरीर स्वस्थ हो ।'!

किन्तु बया प्रचलित शिप्ट आचारो को भी आप नष्ट कर देंगे ? इस विवेक ने हमको बहुत-सी नई मोजनाएँ दी है / नये विचारी का सानवता में समावेश हुआ है ।/”

/अग्निमित्र ! अच्छा क्या है और बुरा वया है ? इसका निर्णय एकांगी हृष्टि से नहीं किया जा सकता ) विष, चिकित्सकन्द्वारा अमृत-कल्प हो जाता है। भगवान्रु की विराद्‌ विभूति में से हम निस्सदिग्ध वस्तु का चुनाव नही कर सकते, उसकी मात्रा को समझ लेना ही हमारा पुरुषार्थ साधारण है। किन्तु एक दिव्य अति भाव है वह है आत्मा की अग्नि ! जिसमें अन्धकार ईंधन बन कर जलता है। उस तेज में सब विशुद्, दिव्य और ग्राह्म हो जाते हैं। आनन्द की यही ग्रोजना अपनी विचार-पद्धति में ले आने की आवश्यकता है। भग से फैले हुए विवेक ने हमारी स्वाभाविकता का दमन कर लिया है | ऐसा मालुम होता है कि हम लोग प्रतिपद सशक, भयभीत, निप्ठुरता से शामित प्राणी हैं हम आत्म- बात हैं, हमारा भविष्य आशामय है, इस आर्य-भाव का प्रचार आवश्यक है। अभी उसी दिन महाकाल के मन्दिर में जो घंटना हुई थी, वह क्‍या हमारी दुर्बलता का प्रमाण नही है। इरावती, जिस पर मन्दिर का सम्पूर्ण अधिकार था, छीन कर विहार को दे दी गई यह वया राज्य का अत्याचार नहीं | किसी ने कुछ कहा ?”

"किन्तु आज मैं एक प्रश्न करूँगा देव ! मैं जब उसे बचाने गया, तब आपने मुझे क्यों रोका ? और वह मन्दिर में नाचती ही रहे, इसके पीछे कितना नैतिक समर्थन है आपको ?”

“अग्नि ! तुम उसे अत्याचार से बचाने गये थे, यह वात तो नहीं थी।

इरावती : २१

तुम्हारा उससे स्नेह था, वह तुम्हारा व्यक्तिगत स्वार्थ था। सार्वजनिक अन्याय समझ कर तुप्त उत्तका प्रतिकार नहीं कर रहे थे और रही नैतिक समर्थन की बात; तो उपासना वाह्य आवरण है, उस विचार-निष्ठा का, जिसमें हमें विश्वास हैं। जिसकी दुःख ज्वाला में मनुष्य व्याकुल हो जाता है, उस विश्व-चिता में मंगलमय नटराज दत्य का अनुकरण, आनन्द की भावना, महाकाल की उपा- सना का वाह्मय स्वरूप है और साथ हो कला की, सौंदर्य की अभिवृद्धि है, जिससे हम वाह्य में, विश्व में, सौदर्य-भावना को सजीव रख सके हैं परन्तु अब हमें फिर से इसके लिए बल और स्फूरतिदायक प्राचीन आर्य क्रियाओं का पुनरुद्धार करना होगा इस बौद्धिक दम्भ के अवसाद को आये जाति से हटाने के लिए आनन्द की प्रतिष्ठा करती होगी समझे !””

/किक्तु आर्य, मैं मन्दिर का पुजारी वन कर जीवित रह सकूंगा [ मुझे ऐसी भाज्ञा दीजिए ।”

नाव फिर से लौट कर भिक्षुणी-विहार के समीप गई थी और सूर्योदय का आरम्भ था| अग्निमित्र ने देखा कि इरावती ऊपर चंक्रम पर खड़ी है; ठीक चुझते हुए तारा की तरह ! इरावती ने भी देखा उसने पुकारा---

“अग्ति !!--

“४इरा !”

“मैं तुम्हारे साथ चलता चाहती हूँ | उस दिन मैंते भूल की थी ठहरो, नाव रोको ।/'

ब्रह्मचारी के चुप रहने से अग्निमित्र ने नाव को घाट की ओर बढ़ाया किन्तु विहार में इरावती के पीछे कई भिक्षुणियों के साथ दो सैनिक भी दिखाई

पड़े। एक सैनिक ने कहा--इरावती ! तुमको कुसुमपुर पहुँचा देने के लिए मैं आया हूँ चलो !””

श्क्ष्यों ? ॥ः

“सम्राट की आज्ञा है ।”

“में नहीं जाऊंगी ?/'

“ऐसा नहीं हो सकता तुमको चलना पड़ेगा ।”

“मैंने क्या अपराध किया है ?”

“यह हम लोग नहीं जानते, चलो'---कह कर वह सैनिक कुछ आगे बढ़ा सहक्ता एक उन्माद नाच उठा इरावती शिप्रा में कूद पड़ी और अग्निमित्र भी एक क्षण में भरिन की वलिष्ठ भुजाओं में इरावती जल के स्तर के ऊपर दिख- लाई पड़ी|॥। ब्रह्मचारी ने दोनों को ताव पर उठा लिया। ऊपर से सैनिकों ते

२२ ; इरावती

पुकार कर कहा--/नान महिला-तीर्य पर लगाओे ।” ब्रह्मचारी से नाव उसी और वढाई अग्निमित्र ने आश्चर्य से पुछा-- यह क्या आर्य !!”

/दन्दो बन कर कुंसुमपुर जाओ। में भी कुछ दिन के लिए उत्तराखण्ड जावा हैं मिल्तूँगा (!/

हशइलकी * ०२

वाहरी ऊँचे स्तम्भ्षों के सहारे भीषण भाले लिए हुए प्रहरी सूर्ति-से खड़े थे सीढ़ियों पर धनुर्धरों की पंक्ति, फिर नीचे विशाल प्रांगण में अश्वारोहियों के कई झुण्ड थे, जिनके खुले हुए खड्ग से प्रभात के आलोक में तीत्र प्रभा झलक रही थी आज साम्राज्य-परिपद्‌ का विशेष आयोजन था मण्डप के भीतरी स्तम्भों से टिके हुए प्रतिहार स्वर्ण-दण्ड लिए खड़े थे ; धलुर्धरों की पंक्ति में से खुली हुई राह से साम्राज्य के कुमारामात्य, वलाधिकृत दण्डनायक व्यावहारिक, सेना के महानायक लोग धीरे-धीरे सीढ़ी से चढ़कर मण्डप गर्भ में रक्‍्खे हुए मंचों पर बैठ रहे थे सवके मुख पर आतंक और व्याकुलता थी। स्वर्ण-जटित द्वार के समीप साम्राज्य का ऊँचा सिंहासन अभी खाली था एक साथ ही तुर्य, शंख पटह की मन्द ध्वनि से वह प्रदेश गूंज उठा स्वर्ण- कपाट के दोनों ओर खड़े कवचधारी प्रहरियों ने स्वर्ण-निसित राज-चिह्न को कपर उठा लिया द्वार खुल पड़ा। यवरनियों का दल छोटे-छोटे चौड़ी धार वाले खड्ग हाथ में लिये मिकला। एक परिक्रमा कर, उन्होंने राजसिहासत के चारों जोर निर्दिष्ट स्थान पर अपना पैर जमाया। फिर छोटी बाँसुरी और डफली लिये मायधी नर्तकियों का दल सभा-मण्डप को नुपूर से ग्रृंजारित करते हुए वायीं भोर जाकर खड़ा हो गया फिर तो ताँता-सा लग गया भूड्र, पटदुह, ताम्बूल-करण्डक, ध्ृम्न-भाजन---जिसमें से अगुरु-कस्तुरी की भीनी महक निकल रहो थी--लिये, रूप यौवनशालिती अन्तःपुरिकाएँ, अनुचरियाँ सिहासन के समीप जाकर खड़ी हो गईं कटिवन्ध के कृपाण और हाथों में त्रिशुल लिए कोशेय वसना युवतियों का अंग-रक्षक दल पीछे बर्द्ध चच्द्राकार बना रहा था। उनके आगे सम्राट और राज-महिपी ने उसी हार से सभा में प्रवेश किया। सव लोग खड़े हो गये तीत्र तूर्य-निनाद से दिशाएँ प्रतिध्वनित हो गईं सम्राद्‌ सिहासन पर बैठे महिपी ते अर्द्आासन ग्रहण किया अमात्य और सामत्तों ने वन्दना की महारानी ने ताम्वूलवाहिनी की ओर संकेत किया उससे ताम्बूल- करण्डक आगे बढ़ाया महिपी ने अपने हाथ में लेकर सम्नाट्‌ के सम्मुख उसे उपस्थित किया स्मित से महाराज ने ग्रहण किया | जय-जयकार से सभामण्डप गूंज कर शान्त मौन हो गया था। सम्राट वृहत्पतिमित्र ने मच्द गंभीर स्वर से पूछा-- खारवेल का दूत कहाँ है २”

२४ : इरावती

साधि विग्रहिक ने विनम्र होकर कहा--“जय हो देव ! वह तोरण पर आज्ञा की अपेक्षा कर रहा है ।" श्र

“बुलाओं उसे !!”

“साधि बिद्रहिक ने महादण्डनायक पुष्यमित्र से कहां---''तो महादण्डनायक उसको यहाँ उपस्थित करें ।!

महादण्डनायक पुप्यमित्र अपने मच से उठकर सीढ़ियों पर आये उनके सकेत से मातव अश्वारोहियों के दत का नायक घोडा बढ़ा कर सामने आया उसने अपना खड्ग ऊँचा करके अभिवादन किया

“नायक ! तुम द्वितीय तोरण पर जाकर कॉलिंग राजदूत को शीघ्र लिया लाओ ।” अण्वारोही नायक तोरण की ओर बेग से बढा

पुष्पमित्र अभी खड़ा था कुछ ही |क्षणो मे सामने के विशाल तोरण में दो अधश्वारोही प्रवेश करते दिखाई पड़े | अश्वारोहियो के समीप उतरकर वे सोपान की ओर अग्रसर हुए

दुत ने सोपान के ऊपर खडे महादण्डनायक को नमस्कार किया पुष्यमित्र में कलिंग-राजदूृत को अपने साथ आने का सकैत किया। साम्राज्य-सिहासन के समीप पहुँचकर राजदूत ने सम्राट्‌ की बन्दना प्रणत हो कर की उसके दोनों ओर पुष्यमित्र और नायक खडे थे राजदूत ने संकेत पाकर कहा--/'महामेधवान भिकलिंगाधिपति चक्रवर्ती खारवेल...” अभी वह इतना ही कह पाया था कि समीप के मचों से प्रतिवाद का स्वर-सा उठा सम्राद्‌ ने तीम्न हृष्टिपात किया प्रतिकूल शब्द चुप हुए सम्रादु ने ही कहा--“हाँ, तो खारवेल ने क्या कहां है?”

“स्वर्ण को जिनमू्ति, जो कलिय की पूज्य प्रतिमा है, जिसे स्वर्गीय सम्राद्‌ अशोऊ ले आये थे, उसके लिए मन्दिर का निर्माण हो चुका है। प्रतिमा को देने की कृपा अब होनी चाहिए सम्राद्‌ ।--दूत ने विना विशेष शिप्टाचार दिखलाये कह डाला वह विनीत था, किन्तु मगंध राज-सभा को देखकर उसके मन में क्षोभ-सा उत्पन्न हो गया था ; कुछ-कुछ टोऊे जाने के कारण रोप भी

“दूत [ तुम्हारा चक्रवर्ती खारबेल इस समय कहाँ है ?”

“भम्राद ! दक्षिणापथ विजय कर लेते के बाद चक्रवर्ती उत्तरी सीमान्त के विजम-स्कंधावार में स्थित हैं।””

सम्रादु की भर्वें कुछ तनी, नधुते फडके और तनिक सँमल कर वैठ गये बोल--'तो यह यारवेल कौ प्रार्थना है या और कुछ ?”

इरावती : ६६

“और कुछ तो नहीं देव ! प्रार्थना ही समझी जाय ।” चतुर दूत ने उत्तर दिया धर्म-कार्य में श्रीमान्‌ की यह सहायता बहुमूल्य होगी

“हूँ ऐसा तो मैं समझता हूँ कि खारवेल को स्वर्ण की आवश्यकता नहीं, किन्तु मूत्ति की ही होगी। अच्छा तुम्हें इसका उत्तर मिलेगा जाओ, विश्राम करो ।” सविनय नमस्कार करके दूत नायक के साथ चला गया। सभा एक क्षण तक मौनच रही

वृद्ध सेनापति ने सांधि विग्नहिक से पूछा-- क्या सैन्य की आवश्यकता होगी ?” ;

“होगी भी तो सैन्य प्रस्तुत है कहाँ ?--धीरे से सांधि विग्नहिक ने कहा चित्तित सम्राद ने भी यह फसफसोहट सुनी और कहा+--

“जय हो देव ! क्या आज्ञा है?” सेनापति ने पूछा किन्तु सम्राट्‌ ने सांधि विग्रहिक की ओर देख कर कहा--- “यह तो स्पष्ट ही छेड़छाड़ है ॥'

“या सैन्य प्रस्तुत होना चाहिए ? यह तो परम भद्टारक ने यथार्थ ही सोचा है ।””

“देवगुप्त ! मृद्गगिरि में कितने ग्रुल्म हैं ?”'

“एक सौ ग़ुल्म देव !” देवगुप्त ने कहा

“वहाँ से खारवेल का स्कन्धावार कितने योजन पर है ? किन्तु इससे क्या, आधी सेना रोहिताश्व दुर्ग में पहुँचनी चाहिए शीघत्र कौन सेना को लेकर शीघ्र पहुँचने का भार लेता है ?”

“जिसको आज्ञा हो ! परम भट्टारक प्रसन्न हों तो मैं ही जाऊँ। किन्तु एक निवेदन है, विन्ा गज-सेना के वहाँ की रक्षा दृढ़ होगी ।/* वृद्ध वलाघिकृत ने कहा .

महानायक के मुख पर कुछ स्मित की रेखाएँ बन-विगड़ रही थीं किल्सु उसके बोले बिना काम नहीं चलता था। पुष्यमित्र ने छोटा-सा खड्ग निकाल कर शिर से लगाया। सम्राट ने पूछा, “तुम कुछ कहना चाहते हो क्या ?”

“हाँ देव !””

ध्क्या ?”!

“कुसुमपुरी को आधी गज-सेना भेजी जा सकती है, अधिक नहीं; क्योंकि -- शोण के तट की भी |

“किन्तु जाता कौन है ?” २६ ६: इरावती

“यह तो परम भट्टारक ही कह सकते हैं ।*

“पृष्यमित्र ! तुमने उस दिन प्रार्थना की थी कि अग्निमित्र का कोई अपराध नहीं उसने तो नदी में कूद कर भागने दाली उस देवदासी को पकंड ही लिया था ।/ सम्रादू ने कहा

/'परम भट्टारक ! और यह उसको मनुष्यता को पुकार थी। वह कुछ मनस्वी तो अवश्य है, परन्तु मालवसेना प्रतिनिधि वीर हैं। मैने स्वयं उसे रण- शिक्षा दी है; केवल उसकी मनस्विता के कारण ही राजभृत्य बनने से उसे वर्जित कर दिया है ।” पुष्यमित्र ने सवितय कहा

“'उसे यहाँ उपस्थित करो ।"” सज्नाटू की आज्ञा मिलते ही महानायक पुष्य- मित्र ने धस्थान किया एक अधीन कर्मचारी को मुद्रा देकर कुछ आदेश दिया

और स्वय उसी सोपान पर खड़े रहे उनकी व्यग्रता छिपने में असमर्थ थी वे टहलने लगे

लौह-शूघला से जकड़ा हुआ अग्निमित्र सोपान पर चढ़ रहा था। सामने राजभृत्य पिता | एक शब्द भी मेरे पक्ष मे कहने के लिए जिन्होंने मूँह नहीं खोला था | किर भी ऊपर यडे महानायक परुष्यमित्र को उसने सिर झुकाया पुष्यमित्र केवल धौरे से इतना ही बोले-- सावधान ! उत्तेज्ञित होता ।/!

आगे दण्डनायक पिता, पीछे बन्दी पृश्न--दोनों सम्राद के सिहासन के समोप पहुँचे अग्विमित्र सिर झुकाये खड़ा रहा | कुसुमपुर की राज-परिपद उसने आज पहले ही देखी

/अग्निमित्र !”

“सम्राटू !” उसने चौककर देखा | वही मन्दिर में इरावती के जुन्य पर प्रतिबन्ध लगाने बाला उसे भिक्षुणी बनाने की आज्ञा देने वाला कुमारामात्य मामधारी आज साम्राज्य के सिहासन पर आसीन है

“तुम अपना अपराध स्वीकार करते हो ?”

नही ।---उसका संश्िप्त उत्तर था

“तो तुमने राजबन्दों को छोनने का प्रयत्न नही किया ?/'

“तेसी करने की इच्छा थी। किन्तु सम्रादू के सामने ही मन्दिर में जब बह बन्दी बनाई जा रही थी तभी ! हिन्तु किया नहीं, कर भी नही सका और वह तो तो आकस्मिक